Saturday, September 14, 2013

Fakir







इस शहर मे मैं जितना बदनाम होता गया
उतना ही शहर मे मेरा नाम होता गया !

इलज़ाम लगाने वालों का पता नहीं
मैं अपनी चाल और भी शाहाना होता गया !

जमीन में सुलाने वालों को इल्म नहीं 
मिट्टीसे ही पैदा हुआ हूँ मैं
दर्द देने वालों खबर क्या
जहर उगलने वालों, मैं
जहरीली हवाओं में और भी मदहोश होता गया !

मेरी खबर लेने वालों को खबर नहीं ,
खबर बनाने वालों को खबर नहीं,
मेरा आशिक उनकी खबर रखता गया !

मेरा ज़िक्र हुआ करता था मेरी महफ़िलों में
अब तो जिक्र और फिक्र दोनों ही है
सभी की महफ़िलों में
मेरा कसूर इतना था,
की मैंने इश्क़ किया था अपने खुदा से
अब जब वो आ मिला था
जिस्म हमसफर सा था और उससे हमनावई न रही
मैं तो उसकी मस्ती में मस्ताना होता गया !

अब मेरी इज्ज़त का ख़याल उसे रेहता है
मेरा इश्क़ न कम हुआ है न होगा
मौसम बदले तो बदले मेरा सुरूर न कम होगा
मैं तो उसके इश्क़ में सच्चा आशिक़ होता गया !!

Monday, August 5, 2013

Mrityunjaya मृत्युंजय لازوال




 
कवि  निर्मोही होता है ,कवि निरंजन होता है
प्रकृति की नयनो मे काला अंजान होता है
न आकांक्षी  होता है, न अभिलाषी होता है
सरल जीवन को मुकुट कर गौरान्वित होता है !

चमक आरसी सी ,विचारों का आँगन होता है
विवादों के बादलों से न वो डरता है, न झिझकता है
नीले गगन में,  जैसे आज़ाद परिंदा होता है
कवि निःसंग होत है ,कवि अंतरंग होता है  !


जीवन के हर पहलू  को ,  ताने बाने सा बुनता वो
बुरे भी और अच्छे भी,पल पल का संचयन करता वो
तटस्थ हो इति, अंत और अनंत का सृजनकर्ता है
कवि कृति कार होता है, कवि निर्माता होता है !


समाज रूपी इस बगिया में कांटे भी और फूल भी
माली बन सबको एक सा चुनता है!
काव्यांजलि का प्रारूप दे उसे,इत्र सा हमपर छिड़कता है!
कवि गंधी होता है, धर्म का संगी होता है !

न पहुंचे जहां सूर्य की किरणें,उस थल पर जाता है
दिवा रात्रि को दिव्यता देता ,अंधकार मिटाता है 
नभ का देदीप्यमान ध्रुव तारा  होता है
कवि अचल भी और अनिकेतन होता है !

समय समय पर ,ऋतंभरा को धर्म ज्ञान से भरता वो 
सभी प्रकार के रसों से उसे सुसज्जित करता वो 
करता है वो काव्य की रचना , और कवि कहलाता है!
कवि मनुस्मृति सा अनुस्मारक होता है !

कौन है जो इस धरा पर मृत्यु को झुटलता है ?
जीवन को जीवटता देता, प्रेरक होता है !
न हो पंच भूतों में फिर भी !
कागज़ के टुकड़ों मे ही ,
और नहीं तो मुख से ही,  स्फुरित होता है
याद दिलाता सबको अपनी, हृदय सा स्पंदित होता है
कवि अनश्वर होता है ,कवि मृत्युंजय होता है!

Dedicated to all writers, poets, noble men and history makers.